एक खूबसूरत और झकझोर देने वाली फिल्म है- खुदा के लिए (Khuda ke liye- In the name of God)। फिल्म कई मायनों में अहम है। यह पाकिस्तानी है। इसने पाकिस्तानी सिनेमा (Pakistani Film) को फिर से जिंदा कर दिया है। ऐसा माना जा रहा है कि भारत-पाकिस्तान के बीच एक-दूसरे की फिल्मों के दिखाने पर लगी पाबंदी भी, इसीसे खत्म होगी। करीब दो महीने पहले दिल्ली में इस फिल्म का खास शो देखने का मौका मिला था। पाकिस्तान फिल्मों की जो छवि दिमाग में बसी है, यह फिल्म उसे पूरी तरह तोड़ देती है।
यह तो हुईं ऊपरी बातें। फिल्म का तानाबाना 9/11 के आतंकी हमले की पृष्ठभूमि में बुना गया है। यह फिल्म आज के समाज के सवाल से टकराती है। यही इस फिल्म को खास बनाती है। मुसलमानों की नई और उदारवादी पीढ़ी के कशमकश को जबान देती है। एक ओर समाज के अंदर पुरातनपंथी विचार से उसको जूझना पढ़ रहा है तो दूसरी ओर, दुनिया उसे एक खास बने बनाए खाँचे में ही देखना चाहती है। यानी वह आतंक का हरकारा है। यह पीढ़ी कई ओर से पिस रही है। अंदरूनी समाज उसे अपनी जकड़न में कैद रखना चाहता है तो बाहरी समाज उसमें दुश्मन की छवि देख रहा है और अपने से दूर धकेल रहा है। ऐसे में नई पीढ़ी खींचतान/तकलीफों / तनावों के बीच अपनी जिंदगी गुजार रही है।
एक मुसलमान परिवार में पैदा होने वाले दो नौजवान भाई, संगीत के सरगम में खो जाना चाहते हैं। तो उनकी राह में एक ओर मजहबी पुरातनपंथी रोड़ा बनते हैं तो दूसरी ओर दुनिया भर चल रही 'आतंक के खिलाफ जंग' उनके ख्वाबों पर पानी फेरने को तैयार है। फिल्म इसी के इर्द-गिर्द घूमती है। लेकिन फिल्म यही नहीं है। इसमें मोहब्बत है, गीत है और खुशनुमा संगीत भी पर कुछ भी बोझिल नहीं।
मुसलमान या इस्लाम कोई इकरंगा चीज नहीं है। इनमें भी कई परतें हैं। आमतौर पर बाहरी समाज या अंदरूनी समाज का पुरातनपंथी तबका और मीडिया उसे इकरंगा और अमानुष के रूप में ही पेश करना चाहता है। लेकिन परतों की बात कोई नहीं करता या करना नहीं चाहता। फिल्म इन परतों को सामने लाती है और उनके बीच के तनाव को दिखाती है।
इस फिल्म में एक और चीज खास है। इसका भारतीय कनेक्शन। नसीरूद्दीन शाह इस फिल्म में हैं। जैसा कि निर्देशक का कहना है कि जब यह रोल उन्होंने नसीरूद्दीन शाह को ऑफर किया तो पहले उन्होंने मना किया। फिर स्क्रिप्ट माँगी। और स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद, बिना पैसे के ही काम करने को राजी हो गए। यानी उस रोल में जरूर कुछ खास था। जी!!!
नसीरूद्दीन शाह भी एक मजहबी आलिम हैं लेकिन मजहब का उदारवादी चेहरा। वह मजहब के आधार पर ही पुरातनपंथियों के तर्कों का जवाब देते हैं। यह मजहब की वह आवाज है, जो आमतौर पर पुरातनपंथियों के शोरगुल में दब जाती है या दबा दी जाती है।
फिल्म में संगीत, सिनेमाटोग्राफी, अभिनय, लोकेशन का चुनाव और सबसे बढ़कर निर्देशन लाजवाब है। मौका मिले तो इस फिल्म को जरूर देखा जाना चाहिए।
नासिर भाई के ब्लाग ढाई आखर से साभार
Friday, August 8, 2008
उदास िदन
बेहद उदास था आज का िदन
खुद से रूठा हुआ अनमना-सा
िदल पर कुछ बोझ उठाए
वजनी सांसों को ढोता हुआ
शाम को थका-हाराबैठा सुस्ताता िदन
रात के आगोश मेंचैन से पडा सो रहा है, देखो
बेहद उदास थागुजरा हुआ आज का िदन...
खुद से रूठा हुआ अनमना-सा
िदल पर कुछ बोझ उठाए
वजनी सांसों को ढोता हुआ
शाम को थका-हाराबैठा सुस्ताता िदन
रात के आगोश मेंचैन से पडा सो रहा है, देखो
बेहद उदास थागुजरा हुआ आज का िदन...
Wednesday, July 9, 2008
Tuesday, July 8, 2008
सत्ता का सेफ्टी वॉल्व की तरह काम किया है माकपा ने
जनता से कितनी दूर हो गई हैं भाकपा और माकपा जैसी नकली कम्युनिस्ट पाटिॆयां, आशा है इसका सबूत जनता को परमाणु करार को लेकर उनके लम्बे ड्रामे के बाद मिल गया होगा। सत्ता के केंद्र में पहली बार इतने लम्बे समय तक रहे वामदलों के बारे में जनता को अब पूरी तरह साफ हो गया है कि क्यों ये दिन-ब-दिन वैचारिक रूप से दीवालिया होते जा रहे हैं।
महंगाई से बड़ा है करार का मुद्दा?
यूपीए के शासनकाल में लगातार महंगाई बढ़ती रही। पहले, तीन महीने के अधिकतम स्तर पर पहुंची, फिर तीन साल के अधिकतम स्तर पर और फिर तेरह साल के अधिकतम स्तर पर। लेकिन इन्होंने कभी इसे मुद्दा नहीं बनाया। यूपीए के शासनकाल में ही जनता के लिए जीना और मुशि्कल होता गया लेकिन परमाणु करार का धूम्र परदा खड़ा कर इन नकली वामपंथियों ने लोगों को बरगलाया। जनता को गुमराह किया कि मुद्दा महंगाई नहीं है, मुद्दा करार है।
माकपा... लाल रंग की भाजपा
आखिरकार जनता को बेवकूफ बनाने का माकपा का ड्रामा खत्म हुआ। अब तो ये भाजपा की तरह यह भी नहीं कह सकती कि एक मौका दो...सुधार देंगे। भाजपा ने १९९८ में परमाणु विस्फोट कर इसे एनडीए की सबसे बड़ी उपलबि्धयों के रूप में गिनाया। आगे बढ़ कर इसे हिंदू बम के रूप में प्रचारित कर इसे साम्प्रदायिक माइलेज लेने की कोशिश की। आज भी उसके लिए यह सबसे बड़ा हथियार है। लेकिन वामपंथी क्यों परमाणु बम परीक्षण का अधिकार को बनाए रखना चाहते हैं? यह कौन सी आमजन की समस्या है।
भाजपा-माकपा के पास बस एक ही मुद्दा
जिसतरह भाजपा ने परमाणु बम परीक्षण का छद्म मुद्दा बनाकर जनता को मूखॆ बनाने की कोशिश की। ठीक उसी राह पर चलते हुए माकपा और उसके सहयोगियों ने जनता को गुमराह किया। भाकपा और अन्य पाटिॆयों में अब कोई फकॆ नहीं बचा है, यह अब उन्हें भी साफ हो गया है जो असमंजस में थे।
महंगाई से बड़ा है करार का मुद्दा?
यूपीए के शासनकाल में लगातार महंगाई बढ़ती रही। पहले, तीन महीने के अधिकतम स्तर पर पहुंची, फिर तीन साल के अधिकतम स्तर पर और फिर तेरह साल के अधिकतम स्तर पर। लेकिन इन्होंने कभी इसे मुद्दा नहीं बनाया। यूपीए के शासनकाल में ही जनता के लिए जीना और मुशि्कल होता गया लेकिन परमाणु करार का धूम्र परदा खड़ा कर इन नकली वामपंथियों ने लोगों को बरगलाया। जनता को गुमराह किया कि मुद्दा महंगाई नहीं है, मुद्दा करार है।
माकपा... लाल रंग की भाजपा
आखिरकार जनता को बेवकूफ बनाने का माकपा का ड्रामा खत्म हुआ। अब तो ये भाजपा की तरह यह भी नहीं कह सकती कि एक मौका दो...सुधार देंगे। भाजपा ने १९९८ में परमाणु विस्फोट कर इसे एनडीए की सबसे बड़ी उपलबि्धयों के रूप में गिनाया। आगे बढ़ कर इसे हिंदू बम के रूप में प्रचारित कर इसे साम्प्रदायिक माइलेज लेने की कोशिश की। आज भी उसके लिए यह सबसे बड़ा हथियार है। लेकिन वामपंथी क्यों परमाणु बम परीक्षण का अधिकार को बनाए रखना चाहते हैं? यह कौन सी आमजन की समस्या है।
भाजपा-माकपा के पास बस एक ही मुद्दा
जिसतरह भाजपा ने परमाणु बम परीक्षण का छद्म मुद्दा बनाकर जनता को मूखॆ बनाने की कोशिश की। ठीक उसी राह पर चलते हुए माकपा और उसके सहयोगियों ने जनता को गुमराह किया। भाकपा और अन्य पाटिॆयों में अब कोई फकॆ नहीं बचा है, यह अब उन्हें भी साफ हो गया है जो असमंजस में थे।
Sunday, July 6, 2008
इंदौर भाजपा के चुनावी अभियान का आगाज है
इंदौर का दंगा एक आगाज है भाजपा का सत्ता पर बने रहने का। चुनावी साल है और दिसम्बर तक विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। उसके बाद लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं। इसके पहले भाजपा सत्ता में आने के लिए लोगों के खून से होली खेलने की पूरी तैयारी कर रही है। गुजरात में भी यही हुआ और दूसरी पारी में इंदौर से बिसमिल्लाह किया गया है। पेट्रोल बम तैयार हैं मंदिरों में सुबह की शाखा में चहलपहल बढ़ गई है, धमॆयुद्ध की तैयारी यहां साफ दीखती है। संघ, विहिप, बजरंग दल और भाजपा के कट्टर तालिबानी येन-केन प्रकारेण सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं।
अगली बार आडवानी बनेंगे पीएम, कैसे?
अगली बार आडवानी पीएम बनेंगे-कैसे? मैं जिस आफिस में काम करता हूं वहां का वरिष्ठ रिपोटॆर (घोर संघ का कट्टर कायॆकरता, भाजपा इंदौर यूनिट का सहयोगी) पिछले छह महीने से यह घोषणा कर रहा है कि भाजपा शासित जिन चार राज्यों में चुनाव होने वाले हैं वहां भाजपा गुजरात की तरह पूणॆ बहुमत में आएगी... और कि आडवानी १५ अगस्त को लाल किले पर तिरंगा फहराएंगे। पहले उसकी बातें मुझे महज प्रलाप लगती थीं लेकिन इंदौर की घटना के बाद अब मुझे डर लगने लगा है। वह रिपोटॆर जितने कांफिडेंस से यह दावा करता है मुझे अब विश्वास होने लगा है कि संघ परिवार अंदर ही अंदर गुजरात का तरीका इन चारों राज्यों और पूरे देश में लागू करने की तैयारी कर रहै है। अब मुझे समझ में आता है कि संघ के कांफिडेंस का राज क्या है। जहांतक मध्यप्रदेश की बात है शिवराज के शासन से जनता खुश नहीं है और भाजपा व संघ को लगने लगा है कि छद्म विकास का ढकोसला जनता को वोटिंग बूथ तक नहीं ला सकता है। इसीलिए वे पुरातन काल से आजमाया हुआ दंगे का नुस्खा अपनाने की अंतिम चाल पर आ गए हैं। ठीक उसी तरह जैसे गुजरात चुनाव की शुरूआत विकास से करने वाले नरसंघारक मोदी ने अंतिम समय में अपने चेहरे का नकाब नोंच कर फेंक दिया था।
दंगाई विशुद्ध वेजिटेरियन हैं
इंदौर की इस घटना पर तीन बातें कहनी हैं-
पहली- शनिवार को मुझे फोन लगाकर लखनऊ की एक पारिविक मित्र ने इंदौर में दंगे का हालचाल लिया... मैंने कहा यह सब भाजपा-संघ की करतूत है... इतना कहते ही उन्होंने जैसे तलवार निकालते हुए हमला करने के स्वर में कहा कश्नीर में मुसलमान क्या कर रहे हैं... देशभर में बम विस्फोट क्या कर रहे हैं? मैंने कहा जो वे करेंगे वही आप करेंगे? उन्होंने फोन पटक दिया। मुझे समझ में जो आया वह यह कि वह दंगें का समथॆन कर रही हैं। वह संघ की कायॆकरता नहीं है लेकिन उसके कुकृत्यों को सही ठहरा रही हैं। वह प्योर वेजीटेरिनयन हैं, उस रास्ते से नहीं गुजरतीं है जिसपर मीट-मांस की दुकान होती है। सुबह-शाम पूजा करती हैं। हां दुष्ट-दलन का जाप भी नियिमत करती हैं। उसी तरह जैसे देश के ६० करोड़ हिंदू करते हैं। हिंदुओं की सोच में आए इस साम्प्रदायिक घुसपैठ को किसका नतीजा कहा जाए? इसका श्रेय जाता है संघ परिवार को।
कमरे से होते हुए इंटरनेट में घुस गए
दूसरी बात-इंदौर में दंगे के दूसरे दिन कुछ बुद्धिजीवी शाम को रीगल चौक पर दंगे के विरोध-प्रदशॆन के लिए इकट्ठा होने का ब्लॉग पर संदेश दिया। ये तथाकथित समाज के पहरुए पहले काफी हाऊसों में सिमटे थे और अब तो कमरे से भी गायब हो गए, इंटरनेट में घुस गए। ये सब विधवा विलापी हैं। इनसे कुछ नहीं होने वाला। जब दंगा हो, जब प्राकृतिक आपदा हो तब इनकी संवेदना जागती है और आंसू की स्याही से मामिॆक कविताएं निकलती हैं। बाकी समय क्या करते हैं ये? जबकि संघ की कमॆठता देखो वह बारहोमास लगा है जहर फैलाने में।
तीसरी बात- जब सबकुछ शांत होता है तो हम सोते हैं सेमिनार करते हैं, हम इस चिंता में घुलते रहते हैं कि उनसे इस मुद्दे पर फलां डिफरेंस है। हम डिफरेंस को और चौड़ा करने में वक्त गुजारते हैं। हम इंतजार करते हैं कि जब वैचारिक एका हो जाएगी तो काम करेंगे तब-तक फिर दंगे हो जाते हैं। हम काम कब करते हैं?
अगली बार आडवानी बनेंगे पीएम, कैसे?
अगली बार आडवानी पीएम बनेंगे-कैसे? मैं जिस आफिस में काम करता हूं वहां का वरिष्ठ रिपोटॆर (घोर संघ का कट्टर कायॆकरता, भाजपा इंदौर यूनिट का सहयोगी) पिछले छह महीने से यह घोषणा कर रहा है कि भाजपा शासित जिन चार राज्यों में चुनाव होने वाले हैं वहां भाजपा गुजरात की तरह पूणॆ बहुमत में आएगी... और कि आडवानी १५ अगस्त को लाल किले पर तिरंगा फहराएंगे। पहले उसकी बातें मुझे महज प्रलाप लगती थीं लेकिन इंदौर की घटना के बाद अब मुझे डर लगने लगा है। वह रिपोटॆर जितने कांफिडेंस से यह दावा करता है मुझे अब विश्वास होने लगा है कि संघ परिवार अंदर ही अंदर गुजरात का तरीका इन चारों राज्यों और पूरे देश में लागू करने की तैयारी कर रहै है। अब मुझे समझ में आता है कि संघ के कांफिडेंस का राज क्या है। जहांतक मध्यप्रदेश की बात है शिवराज के शासन से जनता खुश नहीं है और भाजपा व संघ को लगने लगा है कि छद्म विकास का ढकोसला जनता को वोटिंग बूथ तक नहीं ला सकता है। इसीलिए वे पुरातन काल से आजमाया हुआ दंगे का नुस्खा अपनाने की अंतिम चाल पर आ गए हैं। ठीक उसी तरह जैसे गुजरात चुनाव की शुरूआत विकास से करने वाले नरसंघारक मोदी ने अंतिम समय में अपने चेहरे का नकाब नोंच कर फेंक दिया था।
दंगाई विशुद्ध वेजिटेरियन हैं
इंदौर की इस घटना पर तीन बातें कहनी हैं-
पहली- शनिवार को मुझे फोन लगाकर लखनऊ की एक पारिविक मित्र ने इंदौर में दंगे का हालचाल लिया... मैंने कहा यह सब भाजपा-संघ की करतूत है... इतना कहते ही उन्होंने जैसे तलवार निकालते हुए हमला करने के स्वर में कहा कश्नीर में मुसलमान क्या कर रहे हैं... देशभर में बम विस्फोट क्या कर रहे हैं? मैंने कहा जो वे करेंगे वही आप करेंगे? उन्होंने फोन पटक दिया। मुझे समझ में जो आया वह यह कि वह दंगें का समथॆन कर रही हैं। वह संघ की कायॆकरता नहीं है लेकिन उसके कुकृत्यों को सही ठहरा रही हैं। वह प्योर वेजीटेरिनयन हैं, उस रास्ते से नहीं गुजरतीं है जिसपर मीट-मांस की दुकान होती है। सुबह-शाम पूजा करती हैं। हां दुष्ट-दलन का जाप भी नियिमत करती हैं। उसी तरह जैसे देश के ६० करोड़ हिंदू करते हैं। हिंदुओं की सोच में आए इस साम्प्रदायिक घुसपैठ को किसका नतीजा कहा जाए? इसका श्रेय जाता है संघ परिवार को।
कमरे से होते हुए इंटरनेट में घुस गए
दूसरी बात-इंदौर में दंगे के दूसरे दिन कुछ बुद्धिजीवी शाम को रीगल चौक पर दंगे के विरोध-प्रदशॆन के लिए इकट्ठा होने का ब्लॉग पर संदेश दिया। ये तथाकथित समाज के पहरुए पहले काफी हाऊसों में सिमटे थे और अब तो कमरे से भी गायब हो गए, इंटरनेट में घुस गए। ये सब विधवा विलापी हैं। इनसे कुछ नहीं होने वाला। जब दंगा हो, जब प्राकृतिक आपदा हो तब इनकी संवेदना जागती है और आंसू की स्याही से मामिॆक कविताएं निकलती हैं। बाकी समय क्या करते हैं ये? जबकि संघ की कमॆठता देखो वह बारहोमास लगा है जहर फैलाने में।
तीसरी बात- जब सबकुछ शांत होता है तो हम सोते हैं सेमिनार करते हैं, हम इस चिंता में घुलते रहते हैं कि उनसे इस मुद्दे पर फलां डिफरेंस है। हम डिफरेंस को और चौड़ा करने में वक्त गुजारते हैं। हम इंतजार करते हैं कि जब वैचारिक एका हो जाएगी तो काम करेंगे तब-तक फिर दंगे हो जाते हैं। हम काम कब करते हैं?
Monday, June 30, 2008
अखबारों में लग गया है टीजी का घुन

पत्रकारिता को टीजी का घुन लग गया है। अगर आप मिशन व एथिक्स को मानते हैं, सच्चाई और आपका चोली दामन का साथ है तो आप पुरानी सोच या डाऊन मारकेट हैं और आप इस कचरे से बाहर फेंक दिए जाएंगे जैसे इतिहास को कचरे में फेंक दिया गया है। प्रिंट मीडिया में सच्चाई के मायने काफी बदल गए हैं। यहां टीजी के मुताबिक सच्चाई का चेहरा भी बदल दिया जाता है। सामाजिक सरोकार खास वगॆ के पाठक हैं, जनता नहीं। जो पाठक नहीं है वे भाड़ में जाएं। जो खरीदार हैं, जो घरेलू कचरा जितना ज्यादा पैदा करते हैं वे ही मनुष्य हैं।
वफादार हैं अपने टीजी के लिए
हर अखबार का एक टीजी है यानी टारगेट ग्रुप। मतलब किस वगॆ के प्रति वफादार होना है? सारे अखबार नवधनाढ्य मध्यवगॆ को अपना टीजी बनाने में हांफ रहे हैं। उन्हें पता है वही सबसे ज्यादा खरीदरी करता है वही सबसे ज्यादा खाता है वही सबसे ज्यादा पहनता है वही सबसे ज्यादा कुल्लू मनाली ज्यादा है। आंध्रप्रदेश में किसी किसान ने आत्महत्या कर ली है, दिल्ली में कोई मजदूर फैक्टरी में जल कर मर गया, कोयले की खादानों में मजदूर फंस गए या फिर ढाबे पर खुद को ढोता बचपन उसके सरोकार में नहीं हैं।
ऐसी पत्रकारिता को क्या कहेंगे आप?
Friday, June 27, 2008
Friday, May 30, 2008
पत्तरकारिता को अनामदास का खत मिला

भोपाल के मीडिया में बाजार में इन दिनों काफी उथल-पुथल मची हुई है। हाल ही में लांच हुए दो अखबारों में स्थापित होने की होड़ मची हुई है। दोनों चाहते हैं कि किसी भी तरह से दैनिक भास्कर से आगे निकला जाए। इसी जद्दोजहद के चलते एक अखबार ने तो दूसरे पर कीचड़ उछालना भी शुरु कर दिया है। ज्यादा सस्पेंस न बनाते हुए मैं यह बता देना चाहता हूं कि कीचड़ उछालने वाला अखबार कोई और नहीं बल्कि खुद को सभ्यता और संस्कृति का झंडाबरदार कहने वाला राजस्थान पत्रिका है। राजस्थान पत्रिका ने हाल ही में पत्रिका नाम से भोपाल में संस्करण की शुरुआत की है। कंपनी के मालिक और संपादक गुलाब कोठारी जी को एक बार मुंबई में सुनने का मौका मिला तो ऐसा लगा था कि क्या वाकई आज की गलाकाट कॉरपोरेट प्रतिस्पर्धा के युग में भी इस मानसिकता वाले मालिक हैं। बड़े ही निश्छल भाव से धर्म-कर्म की बातें करने वाले मालिक का अखबार कैसा होगा यह जानने की मेरी इच्छा प्रबल होती चली गई।
कोठारी जी का कहना था कि 'हम प्रतिस्पर्धा में नहीं स्पर्धा में विश्वास रखते हैं। हम दूसरे की लकीर को छोटा करने के बजाय अपनी लकीर बढ़ाने को अपनी शान समझते हैं।'
पर मेरा यह भ्रम बहुत दिनों तक नहीं रह सका। इस मृग-मरीचिका के कुछ ही महीनों बाद मुझे जयपुर में काम करने का मौका मिल गया। कमोबेश जिस समय मैंने वहां ज्वाइन किया उसी महीने आईआरएस की रिपोर्ट आई। जिसमें यह बताया गया कि दैनिक भास्कर जयपुर शहर में अव्वल हो गया है। बस फिर क्या था। कुछ दिनों बाद ही राजस्थान पत्रिका ने पर्चा वार शुरु कर दिया। जिसमें जी भर के भास्कर को कोसा जाता था। पत्रिका की श्रेष्ठता के लिए जो तर्क दिए जाते वो आम लोग तो समझ न आने के चलते पचा लेते पर जानकारों को हैरानी होती कि राजस्थान पत्रिका ऐसा क्यों कर रहा है। यह वही संस्थान है जहां संपादक नाम की संस्था मालिक की कुर्सी के नीचे दबी हुई है। यदि आपको कभी राजस्थान जाने का मौका मिले तो एक बार राजस्थान पत्रिका जरुर पढ़िएगा। आप किसी भी शहर में होंगे तो अखबार की प्रिंटलाइन में आपको श्रीमान गुलाब कोठारी जी का ही नाम पढ़ने को मिलेगा। खैर मैं यह बताना चाह रहा हूं कि कोठारी जी का भाषण तो कुछ और था और हकीकत कुछ और। वहां कर्मचारी से भी बड़ा मालिक है। पूरे समूह की सत्ता महज ५-६ लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है। चाटूकारों को तवज्जो और फायदा दिया जाता है। अपना वहीं बर्ताव पत्रिका भोपाल में भी दिखा रहा है। दूसरे की गलतियों को दिखाकर खुद को श्रेष्ठ साबित करना। यदि किसी अखबार को स्थापित करना हो तो उसके कंटेंट को दूसरे से बेहतर बनाने की कोशिश की जाती है न कि इस तरह से पंपलेट बंटवाए जाते हैं। ऐसा ही कुछ प्रयोग राज एक्सप्रेस ने भी खुद को स्थापित करने के लिए किया था पर पाठकों ने उसे नकार दिया। इस सारी गंदगी से किसी अखबार की छवि अच्छी नहीं बनेगी बल्कि आम नागरिकों में यह भावना घर कर जाएगी कि मीडिया में सबसे ज्यादा गंदगी है। इस तरह के एडवरटाइजमेंट टीवी पर एफएमसीजी उत्पादों के बीच अच्छे लगते हैं अखबारों के बीच नहीं। अखबार की समाज में गरिमा होती है जिसे बनाए रखना हर अखबार का दायित्व है।
कोठारी जी का कहना था कि 'हम प्रतिस्पर्धा में नहीं स्पर्धा में विश्वास रखते हैं। हम दूसरे की लकीर को छोटा करने के बजाय अपनी लकीर बढ़ाने को अपनी शान समझते हैं।'
पर मेरा यह भ्रम बहुत दिनों तक नहीं रह सका। इस मृग-मरीचिका के कुछ ही महीनों बाद मुझे जयपुर में काम करने का मौका मिल गया। कमोबेश जिस समय मैंने वहां ज्वाइन किया उसी महीने आईआरएस की रिपोर्ट आई। जिसमें यह बताया गया कि दैनिक भास्कर जयपुर शहर में अव्वल हो गया है। बस फिर क्या था। कुछ दिनों बाद ही राजस्थान पत्रिका ने पर्चा वार शुरु कर दिया। जिसमें जी भर के भास्कर को कोसा जाता था। पत्रिका की श्रेष्ठता के लिए जो तर्क दिए जाते वो आम लोग तो समझ न आने के चलते पचा लेते पर जानकारों को हैरानी होती कि राजस्थान पत्रिका ऐसा क्यों कर रहा है। यह वही संस्थान है जहां संपादक नाम की संस्था मालिक की कुर्सी के नीचे दबी हुई है। यदि आपको कभी राजस्थान जाने का मौका मिले तो एक बार राजस्थान पत्रिका जरुर पढ़िएगा। आप किसी भी शहर में होंगे तो अखबार की प्रिंटलाइन में आपको श्रीमान गुलाब कोठारी जी का ही नाम पढ़ने को मिलेगा। खैर मैं यह बताना चाह रहा हूं कि कोठारी जी का भाषण तो कुछ और था और हकीकत कुछ और। वहां कर्मचारी से भी बड़ा मालिक है। पूरे समूह की सत्ता महज ५-६ लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है। चाटूकारों को तवज्जो और फायदा दिया जाता है। अपना वहीं बर्ताव पत्रिका भोपाल में भी दिखा रहा है। दूसरे की गलतियों को दिखाकर खुद को श्रेष्ठ साबित करना। यदि किसी अखबार को स्थापित करना हो तो उसके कंटेंट को दूसरे से बेहतर बनाने की कोशिश की जाती है न कि इस तरह से पंपलेट बंटवाए जाते हैं। ऐसा ही कुछ प्रयोग राज एक्सप्रेस ने भी खुद को स्थापित करने के लिए किया था पर पाठकों ने उसे नकार दिया। इस सारी गंदगी से किसी अखबार की छवि अच्छी नहीं बनेगी बल्कि आम नागरिकों में यह भावना घर कर जाएगी कि मीडिया में सबसे ज्यादा गंदगी है। इस तरह के एडवरटाइजमेंट टीवी पर एफएमसीजी उत्पादों के बीच अच्छे लगते हैं अखबारों के बीच नहीं। अखबार की समाज में गरिमा होती है जिसे बनाए रखना हर अखबार का दायित्व है।
Saturday, May 24, 2008
पत्तरकारिताः जो जानते हैं वह न्यूज नहीं

पत्रकारिता
पत्तरकारिता के बारे में उम्मीद है डॉल ब्लागस्पाट पर एक बेहद सुंदर लघु कविता मुझे मिली है इसे पढ़िए अगर आप पत्रकार हैं तो आपके समझ में बात आ जाएगी और नहीं हैं तो पत्रकारिता के बारे में अंदाजा लगाते रहिए
जो सोचता हूं,
वो कर नहीं पा रहा जो कर रहा हूं,
उसे समझ नहीं पा रहा जो समझ पा रहा हूं
वो कोई तसल्ली देने वाली चीज़ हर्गिज नहीं..
(पत्रकारिता के बारे में...दीपक)
पत्तरकारिता के बारे में उम्मीद है डॉल ब्लागस्पाट पर एक बेहद सुंदर लघु कविता मुझे मिली है इसे पढ़िए अगर आप पत्रकार हैं तो आपके समझ में बात आ जाएगी और नहीं हैं तो पत्रकारिता के बारे में अंदाजा लगाते रहिए
जो सोचता हूं,
वो कर नहीं पा रहा जो कर रहा हूं,
उसे समझ नहीं पा रहा जो समझ पा रहा हूं
वो कोई तसल्ली देने वाली चीज़ हर्गिज नहीं..
(पत्रकारिता के बारे में...दीपक)
Thursday, May 22, 2008
मुनाफे का खेल आईपीएल ः कंपनियों की जीत जनता की हार
आईपीएल स्वदेशी बनाम विदेशी का मैच है। यह इस बात का गवाह है कि किस तरह पूंजी का प्रवाह देश की सीमाओं को नेस्तनाबूद कर देता है। यह कारनामा फुटबाल ने यूरोप में बहुत पहले ही कर दिखाया है। कंपनियों ने फुटबाल को पहले दो देशों के बीच छद्म युद्ध का जामा पहनाया। जैसे कि ब्राजील की फुटबाल टीम वल्डॆ कप हार जाती है तो वहां की राज सत्ता पर डगमगा जाती है यहां तक कि एक बार तो राष्ट्रपति तक को इस्तीफा देना पड़ गया था। कई खिलाड़ियों की हत्या उनके समथॆकों ने ही कर दी। यही स्टेज क्रिकेट के मामले में इस समय भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों की है। टीम हारती है तो लोगों में जबरदस्त रोष छा जाता है। मैदान में पत्थरबाजी हूटिंग और स्वदेश लौटने पर अंडे का स्वगत वही प्रवृत्ति है।यूरोप में दूसरा चरण आया फुटबॉल खिलाड़ियों को ब्रांड बनाने का तो बैकेहम और रोनाल्डो जैसे खिलाड़ी पैदा किए गए। ठीक वैसे ही जैसे भारत में सचिन तेंदुलकर और धोनी। तीसरा चरण खेल से अधिकतम मुनाफा निचोड़ने का आया। कहा जाता है कि पैसा ही पैसा को खींचता है इसीलिए ब्रांडेड खिलाड़ियों की इतनी बोली लगी कि जिसे वे कभी सपने में भी नहीं सोच सकते थे। भव्यता देने के लिए मैंदान पर ही नाच गाने से लेकर सेलिब्रिटीज तक को उतारा गया। चीयर लीडसॆ की संकल्पना यहीं से उपजी है। ठीक इसी तरह आईपीएल में खिलाड़ियों की बोली लगी, धन की बरिश से नवधनाढ्य देश का मनबढ़ दशॆक बावला हो गया। उसे और बावला करने के लिए सेलिब्रिटीज से लेकर चीयरलीडसॆ को उतारा गया। वहां हर एक खिलाड़ी बिकाऊ है उसकी प्रतिबद्धता देश से नहीं मुनाफे से होती है। मैदान में उसकी बोली नहीं खेल की बोली लगाई जाती है। यह खेल नहीं मुनाफे का तमाशा बन गया है। धन की बाढ़ है जिसमें खेल भावना डूब गई है। जैसे पूंजीवादी प्रतिस्पधाॆ का स्वभाव २१वीं सदी में वित्तीय एकाधिकार का हो गया है उसी तरह खेल अब दो टीमों के बीच का खेल नहीं रह गया बल्कि बाजार पर एकाधिकार जमाने के लिए कंपनियों के बीच जंग बन गया है। पूंजीवाद का एक खास रोग है वह है काले धन की समानांतर अथॆव्यवस्था होना। ठीक वैसे ही जैसे बाक्सिंग में सारी कमाई ही सट्टे की होती है। आईपीएल में भी काले धन की समानांतर बारिश हो रही है जिसकी खबर है भी नहीं भी।
India set for big role in oil
For the first time India will be participating in World Petroleum Council (WPC) Congress in a big way. The conference is scheduled in Madrid from June 29 to July 3. Indian oil companies will showcase their areas of expertise and also field prominent speakers from the industry to formulate India’s position in key policy issues pertaining to energy security. Efforts are afoot have an India pavilion so as to give a comprehensive picture of development of the country’s oil and gas sector. Earlier, India’s participation in quadrennial event was limited and it was allowed participation only in deliberations.The WPC is the largest international gathering in the oil and gas industry. Governments, national and international oil companies and representatives of international institutions and suppliers of goods and services worldwide will come together in Madrid to discuss the future of the industry. India- Big marketIndia's crude oil import bill has moved up over 38 per cent to $61.16 billion in the first 11 months of 2007-08. India imported 111.089 million tonne of crude oil between April-February 2007-2008 for Rs 2,43,205.5 crore ($61.165 billion) when compared with 101.213 million tonne imported a year ago for Rs 2,00,321 crore ($44.124 billion), according to latest data available from the petroleum ministry.India also imported 20.19 million tonne of petroleum products, mainly naphtha, LPG, kerosene and diesel, for Rs 54,180 crore ($13.4 billion). Fuel consumption increased 6.4% to 116.711 million tonne between April-February 2007-2008 on double-digit growth in diesel demand at 43.27 million tonne.The Madrid Congress will commemorate the 75th anniversary of the World Petroleum Council, the non-profit organization that promotes the congress and was created in 1933. The Council, made up of 60 countries that account for over 95 per cent of global economic activity, acts as a forum for discussing issues facing the oil industry and is strictly apolitical
Thursday, May 1, 2008
१ मई पर चुप्पावादियों का स्वागत
जहां तक मेरा अनुमान है मीडिया उद्योग में कुछ सोचने वाले पत्रकार मजदूर भाई बचे होंगे तो कहीं न कहीं तो एक्टिविज्म से जुड़े होंगे। इसी नाते इच्छा होती है ऐसे लोगों को सम्मानित किया जाए इसलिए नहीं कि वे कुछ सोच पाते हैं बल्कि इसलिए कि वे चुप हैं। १ मई को आईए इसी तरह मनाएं और चुप रहने वाले पत्रकार मजदूर बंधुओं का स्वागत करने की तैयारी करें।
क्यों मनाएं दिवस
थकी, कुढ़ती, कसमसाती ऊंघती पत्रकारों की आबादी ने अपने बौद्धिक क्षमता का कापी राइट लंकाधिपितयों को दे दिया है। अब उनकी सारी क्षमता उनके दुगॆ बनाने में ही लग गई है। जी कसमसाता है तो एकाध ब्लॉग-व्लॉग लिख दिया या चंदा देकर पाप काट लिया। मई दिवस मनाना भी पाप काटने जैसा है। मना लिया एक दिन के लिए द्रवित हो गए।
क्यों मनाएं दिवस
थकी, कुढ़ती, कसमसाती ऊंघती पत्रकारों की आबादी ने अपने बौद्धिक क्षमता का कापी राइट लंकाधिपितयों को दे दिया है। अब उनकी सारी क्षमता उनके दुगॆ बनाने में ही लग गई है। जी कसमसाता है तो एकाध ब्लॉग-व्लॉग लिख दिया या चंदा देकर पाप काट लिया। मई दिवस मनाना भी पाप काटने जैसा है। मना लिया एक दिन के लिए द्रवित हो गए।
Thursday, April 17, 2008
अब तो भारत के संविधान की भी समीक्षा होनी चाहिए
नेपाली संविधान सभा के चुनाव में माओवादियों की जीत से भारत में मलाई छांटने वालों के चेहरे पर डर और सिहरन की सिलवटें देखीं जा सकती हैं। उन्हें डर किस बात का है? दरअसल संविधान को तकॆ और प्रश्न से परे दैवीय ग्रंथ बनाकर ६० साल से कथरी ओढ़ने वाली जनता के कफन से भी टैक्स वसूलने वाली इस जमात को डर है कि कहीं यहां भी उस पवित्र संविधान पर प्रश्नचिन्ह न उठने लगे। यह तो सिफॆ बहाना है कि नेपाल घटनाक्रम से यहां माओवादी और हिंसक हो जाएंगे। लेकिन देर-सबेर भारतीय संविधान पर सवाल तो खड़ा होगा ही।
संविधान है या षणयंत्र
जनता को भेड़ बनाए रखने के लिए पहले राजा-महराजा खुद को भगवान घोषित करने का षणयंत्र रचते थे। जमाना बदला अब लोग बेवकूफ नहीं रहे कि भगवान के नाम पर खुद को मुरदाखोरों के हवाले कर दें। आज के शाषकों के लिए एक ऐसी चीज अपरिहायॆ थी जिसके नाम पर वह जनता को अपने पैरों तले दबाए रख सके। वह चीज बन गई संविधान। शासकों के लिए यह वह ढाल है जो उन्हें जनता के नाक में नथ पहनाने के सारे अधिकार देता है। यह ऐसा आलादीन का चिराग है जो शासकों के लिए उनके मनपसंद दमन के हथियार यूं ही मुहैया करा देता है। इसके लिए उदाहरण नहीं देना होगा कि कैसे न्यायपालिका कुछ मुट्ठी भर लोगों के लिए न्याय के साथ बलात्कार करती है, सुरक्षा बल उनके लिए आम जनता का खून बहाने से भी नहीं हिचकते, नीतियां उनकी झोली भरने के लिए बनायी जाती हैं।तो भाईसाहब यह संविधान जो है वह षणयंत्र है और इस पर भी सवाल उठेगा ही। इस सवाल को माओवादी हिंसा या आतंकवाद के नाम पर बहुत दिन तक लॉकर में बंद नहीं रख सकते। नेपाल के जन आंदोलन तो यही बताता है।
संविधान है या षणयंत्र
जनता को भेड़ बनाए रखने के लिए पहले राजा-महराजा खुद को भगवान घोषित करने का षणयंत्र रचते थे। जमाना बदला अब लोग बेवकूफ नहीं रहे कि भगवान के नाम पर खुद को मुरदाखोरों के हवाले कर दें। आज के शाषकों के लिए एक ऐसी चीज अपरिहायॆ थी जिसके नाम पर वह जनता को अपने पैरों तले दबाए रख सके। वह चीज बन गई संविधान। शासकों के लिए यह वह ढाल है जो उन्हें जनता के नाक में नथ पहनाने के सारे अधिकार देता है। यह ऐसा आलादीन का चिराग है जो शासकों के लिए उनके मनपसंद दमन के हथियार यूं ही मुहैया करा देता है। इसके लिए उदाहरण नहीं देना होगा कि कैसे न्यायपालिका कुछ मुट्ठी भर लोगों के लिए न्याय के साथ बलात्कार करती है, सुरक्षा बल उनके लिए आम जनता का खून बहाने से भी नहीं हिचकते, नीतियां उनकी झोली भरने के लिए बनायी जाती हैं।तो भाईसाहब यह संविधान जो है वह षणयंत्र है और इस पर भी सवाल उठेगा ही। इस सवाल को माओवादी हिंसा या आतंकवाद के नाम पर बहुत दिन तक लॉकर में बंद नहीं रख सकते। नेपाल के जन आंदोलन तो यही बताता है।
Sunday, April 13, 2008
स्वागत है
स्वागत है ब्लाग पत्तरकारिता पर। यहां मिलेगा कुछ ह्यूमर, कुछ सीरीयसनेस, कुछ आंकड़े, कुछ आलोचनाएं, कुछ साईंस और न्यूज रूम यानी कि मीडिया के असली तानाबाने से संबंधित खबरें।
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