इंदौर का दंगा एक आगाज है भाजपा का सत्ता पर बने रहने का। चुनावी साल है और दिसम्बर तक विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। उसके बाद लोकसभा के चुनाव होने वाले हैं। इसके पहले भाजपा सत्ता में आने के लिए लोगों के खून से होली खेलने की पूरी तैयारी कर रही है। गुजरात में भी यही हुआ और दूसरी पारी में इंदौर से बिसमिल्लाह किया गया है। पेट्रोल बम तैयार हैं मंदिरों में सुबह की शाखा में चहलपहल बढ़ गई है, धमॆयुद्ध की तैयारी यहां साफ दीखती है। संघ, विहिप, बजरंग दल और भाजपा के कट्टर तालिबानी येन-केन प्रकारेण सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं।
अगली बार आडवानी बनेंगे पीएम, कैसे?
अगली बार आडवानी पीएम बनेंगे-कैसे? मैं जिस आफिस में काम करता हूं वहां का वरिष्ठ रिपोटॆर (घोर संघ का कट्टर कायॆकरता, भाजपा इंदौर यूनिट का सहयोगी) पिछले छह महीने से यह घोषणा कर रहा है कि भाजपा शासित जिन चार राज्यों में चुनाव होने वाले हैं वहां भाजपा गुजरात की तरह पूणॆ बहुमत में आएगी... और कि आडवानी १५ अगस्त को लाल किले पर तिरंगा फहराएंगे। पहले उसकी बातें मुझे महज प्रलाप लगती थीं लेकिन इंदौर की घटना के बाद अब मुझे डर लगने लगा है। वह रिपोटॆर जितने कांफिडेंस से यह दावा करता है मुझे अब विश्वास होने लगा है कि संघ परिवार अंदर ही अंदर गुजरात का तरीका इन चारों राज्यों और पूरे देश में लागू करने की तैयारी कर रहै है। अब मुझे समझ में आता है कि संघ के कांफिडेंस का राज क्या है। जहांतक मध्यप्रदेश की बात है शिवराज के शासन से जनता खुश नहीं है और भाजपा व संघ को लगने लगा है कि छद्म विकास का ढकोसला जनता को वोटिंग बूथ तक नहीं ला सकता है। इसीलिए वे पुरातन काल से आजमाया हुआ दंगे का नुस्खा अपनाने की अंतिम चाल पर आ गए हैं। ठीक उसी तरह जैसे गुजरात चुनाव की शुरूआत विकास से करने वाले नरसंघारक मोदी ने अंतिम समय में अपने चेहरे का नकाब नोंच कर फेंक दिया था।
दंगाई विशुद्ध वेजिटेरियन हैं
इंदौर की इस घटना पर तीन बातें कहनी हैं-
पहली- शनिवार को मुझे फोन लगाकर लखनऊ की एक पारिविक मित्र ने इंदौर में दंगे का हालचाल लिया... मैंने कहा यह सब भाजपा-संघ की करतूत है... इतना कहते ही उन्होंने जैसे तलवार निकालते हुए हमला करने के स्वर में कहा कश्नीर में मुसलमान क्या कर रहे हैं... देशभर में बम विस्फोट क्या कर रहे हैं? मैंने कहा जो वे करेंगे वही आप करेंगे? उन्होंने फोन पटक दिया। मुझे समझ में जो आया वह यह कि वह दंगें का समथॆन कर रही हैं। वह संघ की कायॆकरता नहीं है लेकिन उसके कुकृत्यों को सही ठहरा रही हैं। वह प्योर वेजीटेरिनयन हैं, उस रास्ते से नहीं गुजरतीं है जिसपर मीट-मांस की दुकान होती है। सुबह-शाम पूजा करती हैं। हां दुष्ट-दलन का जाप भी नियिमत करती हैं। उसी तरह जैसे देश के ६० करोड़ हिंदू करते हैं। हिंदुओं की सोच में आए इस साम्प्रदायिक घुसपैठ को किसका नतीजा कहा जाए? इसका श्रेय जाता है संघ परिवार को।
कमरे से होते हुए इंटरनेट में घुस गए
दूसरी बात-इंदौर में दंगे के दूसरे दिन कुछ बुद्धिजीवी शाम को रीगल चौक पर दंगे के विरोध-प्रदशॆन के लिए इकट्ठा होने का ब्लॉग पर संदेश दिया। ये तथाकथित समाज के पहरुए पहले काफी हाऊसों में सिमटे थे और अब तो कमरे से भी गायब हो गए, इंटरनेट में घुस गए। ये सब विधवा विलापी हैं। इनसे कुछ नहीं होने वाला। जब दंगा हो, जब प्राकृतिक आपदा हो तब इनकी संवेदना जागती है और आंसू की स्याही से मामिॆक कविताएं निकलती हैं। बाकी समय क्या करते हैं ये? जबकि संघ की कमॆठता देखो वह बारहोमास लगा है जहर फैलाने में।
तीसरी बात- जब सबकुछ शांत होता है तो हम सोते हैं सेमिनार करते हैं, हम इस चिंता में घुलते रहते हैं कि उनसे इस मुद्दे पर फलां डिफरेंस है। हम डिफरेंस को और चौड़ा करने में वक्त गुजारते हैं। हम इंतजार करते हैं कि जब वैचारिक एका हो जाएगी तो काम करेंगे तब-तक फिर दंगे हो जाते हैं। हम काम कब करते हैं?
Sunday, July 6, 2008
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