सोनभद्र में 13 कुंतल शुद्ध सोने की बनी प्रतिमा का यूं ही पड़े रहना स्तब्ध कर देता है। पोलवा शिव पहाड़ी, सोनभद्र की खुदाई में निकली सोने की एक टन दो कुंतल, 80 किलो की कृष्ण की मूर्ति खुले में पड़ी है
मान्यतानुसार नगर ऊंटारी के राजा भवानी सिंह पोलवा की शिव पहाड़ी से सोने की मूर्ति निकलवाकर ले गये। वहां भव्य मंदिर का निर्माण कराकर उसे स्थापित करा दिया। मूर्ति के बाबत कोई प्रमाणिक साक्ष्य तो नहीं मिलता लेकिन गुप्तनाथ तिवारी की पुस्तक के अनुसार मूर्ति का निर्माण गोलकुण्डा हैदराबाद में हुआ था। कब और किसने कराया, इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता। माना जाता है भगवान कृष्ण की मूर्ति औरंगजेब के हाथ लगी। उसे खंडित करने के लिए हैदराबाद से दिल्ली ले जाया गया। मूर्ति की चमक दमक पर औरंगजेब की पुत्री शहजादी जेबुन्निसा इस कदर दीवानी हुई कि उसने सुन्दर मूर्ति को खंडित होने से बचा लिया। उसने शिवाजी को पत्र भेजकर मूर्ति प्रेम का इजहार किया था। मूर्ति पाने में असफल शिवाजी गुरु रामदास के पास गए और मूर्ति वापस लाने के प्रति जिज्ञासा व्यक्त की तो उन्होंने शिवाजी को आश्र्वस्त किया कि वह मूर्ति आपको मिल जाएगी। उत्तर पूर्वी काल के दौरान जब मराठों का इस क्षेत्र पर कब्जा हुआ तो उन्होंने औरंगजेब से झटक कर उस बहुमूल्य सोने की मूर्ति को उक्त पहाड़ी में छिपा दिया। समझा जाता है कि उसी समय से उक्त पहाड़ी को शिव पहाड़ी का नाम भी दे दिया गया हो। मूर्ति के बारे में दूसरी जनश्रुति है कि शिव पहाड़ी के पास ही सोन पहाड़ी भी है जहां पहले सोने की प्रचुरता थी। उस समय राजा बरियार शाह का शासन था। लोगों का मानना है राजा बरियार शाह ने ही सोने से उक्त मूर्ति का निर्माण कराया होगा। जो भी प्रामणिक तथ्य हो किंतु भगवान की अनोखी बहुमूल्य प्रतिमा का दर्शन करने के लिए प्रतिवर्ष देश विदेश से हजारों श्रद्धालु वंशीधर मंदिर ऊंटारी पहुंचते हैं। वंशीधर की स्वर्ण प्रतिमा के साथ राधा जी की अष्टधातु मूर्ति स्थापित की गई है। बीएचयू के प्रौद्योगिकी संस्थान के रसायन अभियांत्रिकी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. के.के. श्रीवास्तव बताते हैं कि आदमी का शरीर लगभग 85 फीसदी पानी से बना होता है और सोने का घनत्व पानी की तुलना में 19 गुना अधिक होता है। ऐसे में साढ़े चार फीट की कृष्ण की प्रतिमा का ही वजन लगभग नौ कुंतल से अधिक हो जाता है। ठोस कमलदल व नाग का वजन मिलाकर अनुमानत: वजन 13 कुंतल के आसपास होना आश्चर्य की बात नहीं। मूर्ति के बारे में अभी तक विशेषज्ञ यह नहीं पता कर पाए हैं कि यह कब की बनी हुई है। हलांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह मूर्ति कृष्ण की सबी मूर्तियों से काफी भिन्न है और शायद दुनिया में अपने तरह की अकेली है। इसीलिए इसके संरक्षित करने की बेहद जरूरत है।
Sunday, November 29, 2009
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