Thursday, May 22, 2008

मुनाफे का खेल आईपीएल ः कंपनियों की जीत जनता की हार

आईपीएल स्वदेशी बनाम विदेशी का मैच है। यह इस बात का गवाह है कि किस तरह पूंजी का प्रवाह देश की सीमाओं को नेस्तनाबूद कर देता है। यह कारनामा फुटबाल ने यूरोप में बहुत पहले ही कर दिखाया है। कंपनियों ने फुटबाल को पहले दो देशों के बीच छद्म युद्ध का जामा पहनाया। जैसे कि ब्राजील की फुटबाल टीम वल्डॆ कप हार जाती है तो वहां की राज सत्ता पर डगमगा जाती है यहां तक कि एक बार तो राष्ट्रपति तक को इस्तीफा देना पड़ गया था। कई खिलाड़ियों की हत्या उनके समथॆकों ने ही कर दी। यही स्टेज क्रिकेट के मामले में इस समय भारत, पाकिस्तान और श्रीलंका जैसे देशों की है। टीम हारती है तो लोगों में जबरदस्त रोष छा जाता है। मैदान में पत्थरबाजी हूटिंग और स्वदेश लौटने पर अंडे का स्वगत वही प्रवृत्ति है।यूरोप में दूसरा चरण आया फुटबॉल खिलाड़ियों को ब्रांड बनाने का तो बैकेहम और रोनाल्डो जैसे खिलाड़ी पैदा किए गए। ठीक वैसे ही जैसे भारत में सचिन तेंदुलकर और धोनी। तीसरा चरण खेल से अधिकतम मुनाफा निचोड़ने का आया। कहा जाता है कि पैसा ही पैसा को खींचता है इसीलिए ब्रांडेड खिलाड़ियों की इतनी बोली लगी कि जिसे वे कभी सपने में भी नहीं सोच सकते थे। भव्यता देने के लिए मैंदान पर ही नाच गाने से लेकर सेलिब्रिटीज तक को उतारा गया। चीयर लीडसॆ की संकल्पना यहीं से उपजी है। ठीक इसी तरह आईपीएल में खिलाड़ियों की बोली लगी, धन की बरिश से नवधनाढ्य देश का मनबढ़ दशॆक बावला हो गया। उसे और बावला करने के लिए सेलिब्रिटीज से लेकर चीयरलीडसॆ को उतारा गया। वहां हर एक खिलाड़ी बिकाऊ है उसकी प्रतिबद्धता देश से नहीं मुनाफे से होती है। मैदान में उसकी बोली नहीं खेल की बोली लगाई जाती है। यह खेल नहीं मुनाफे का तमाशा बन गया है। धन की बाढ़ है जिसमें खेल भावना डूब गई है। जैसे पूंजीवादी प्रतिस्पधाॆ का स्वभाव २१वीं सदी में वित्तीय एकाधिकार का हो गया है उसी तरह खेल अब दो टीमों के बीच का खेल नहीं रह गया बल्कि बाजार पर एकाधिकार जमाने के लिए कंपनियों के बीच जंग बन गया है। पूंजीवाद का एक खास रोग है वह है काले धन की समानांतर अथॆव्यवस्था होना। ठीक वैसे ही जैसे बाक्सिंग में सारी कमाई ही सट्टे की होती है। आईपीएल में भी काले धन की समानांतर बारिश हो रही है जिसकी खबर है भी नहीं भी।

No comments: