Sunday, March 14, 2010

मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा


बरेली --सांप्रदायि-सद्भाव लौटाने --लिए बुलाई गई बैठ-में रो पड़े शायर वसीम बरेलवी।

मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा

यह एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा

मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा
कोई चिराग नहीं हूँ जो फिर जला लेगा

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए
जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा

मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे
सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी वो सब जला लेगा

हज़ार तोड़ के आ जाऊं उस से रिश्ता वसीम
मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा
vaseem bareilvy

3 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत आभार वसीम जी की रचना पढ़वाने का.

Devatosh said...

मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे
सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी वो सब जला लेगा


Mai Waseem Sahab ki gazlo mai apnay aap ko paata hun. Shukriya. Waseem Sahab.

रज़िया "राज़" said...

मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा
कोई चिराग नहीं हूँ जो फिर जला लेगा
संवेदना से आहत रचना वसीम की...