Tuesday, March 16, 2010

इनकी मुस्कान में उनका दर्द






ये हैं डाक्टर नयना पटेल की आणंद मे क्लिनिक। यहां 10 दिन के बच्चे के साथ किराए की कोख से पैदा हुए 10 दिन के ब्चचे को निहारते हुए उसके आभासी मां बाप कैसे मुस्करा रहे हैं लेकिन ऊपर इन भारतीय मांओं को देखिए। ये रोजी रोटी के लिए अपनी कोख को यहां बेचती हैं। यही तेजी से बढ़ता भारत देश। हा धिक्।

Sunday, March 14, 2010

मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा


बरेली --सांप्रदायि-सद्भाव लौटाने --लिए बुलाई गई बैठ-में रो पड़े शायर वसीम बरेलवी।

मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तेहान क्या लेगा

यह एक मेला है वादा किसी से क्या लेगा
ढलेगा दिन तो हर एक अपना रास्ता लेगा

मैं बुझ गया तो हमेशा को बुझ ही जाऊँगा
कोई चिराग नहीं हूँ जो फिर जला लेगा

कलेजा चाहिए दुश्मन से दुश्मनी के लिए
जो बे-अमल है वो बदला किसी से क्या लेगा

मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे
सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी वो सब जला लेगा

हज़ार तोड़ के आ जाऊं उस से रिश्ता वसीम
मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा
vaseem bareilvy

Saturday, February 6, 2010

रोज मरते हैं कभी कभी झुंड में भी जैसे आज



FEBRUARY 05, -Hyderabad: Rescue team recover a body fro the debris of an under-construction building that collapsed in Narayanguda area in Hyderabad on Friday.agency
हैदराबाद के निर्माण साइट पर पूरी छत ही ढह गई। दर्जन भर मजदूर जिंदा दफ्न हो गए। छह मजदूर मारे गए। फोटो आई है लेकिन कहीं किसी अखबार में लग जाए तो हमें जरूर बताइएगा। यह है हमारी जमीर, हिंदी पत्रकारिता का।
निर्माण कार्यों में लगे मजदूर जिसमें महिलाओं की संख्या पर्याप्त होती है, रोज मर रहे हैं। खबर छपती है लेकिन सिर्फ सूचना होती है इतने मरे। यह खबर गायब होती है क्या निर्माण कंपनी ने सुरक्षा के मानक अपनाए थे? असल में देश में जो जबरदस्त मुनाफे का कारोबार चल रहा है उसमें सुरक्षा मानकों को न लागू करना भी बचत का एक हिस्सा है। यह अलग बात है कि यह बचत गरीबों-मजदूरों के खून से रंगा हुआ है। नोएडा में जनवरी माह में ही १२ मजदूर मारे गए। किसी को कोई फरक नहीं पड़ता। असल में इस मुनाफे की एक टुकड़ा हमारी जेबों में भी तो जाता है? क्या नहीं जाता है? जरा सोचिए

Tuesday, January 26, 2010

किसकी जनवरी है किसका अगस्त है






1-Protesters throwing stones towards police during a protest in Srinagar on Tuesday
2-Srinagar: Security men conduct a checking in Srinagar on Monday. Security has been beefed up ahead of Republic Day celebrations.
3-Guwahati : A policeman conducts a checking in Guwahati on Monday. Security has been beefed up ahead of Republic Day celebrations.
4-Srinagar: A J&K police woman consatable helps her commander in wearing her shoes before the Republic Day parade at Bakshi Stadium in Srinagar on Tuesday.

Monday, January 25, 2010

तेलंगाना के लिए-जागो रे................



तेलंगाना आंदोलन चरम पर है। और इसके समर्थन में राज्य की संसदीय राजनैतिक पार्टियों से लेकर वकील, छात्र, मेडिकल छात्र समर्थन में आ गए हैं। यहां तक कि माओवादियों ने भी इसका समर्थन किया है। आंध्र के परंपरागत कलाकार भी अपनी धुनों से अलख जगाने में जुट गए हैं। तेलंगाना की मांग को लेकर पहली बार 1969 में प्रदर्शन हुआ। 1972 में पृथक तेलंगाना राज्य का आंदोलन विधिवत रूप से शुरू हुआ।

Friday, January 22, 2010

अभिव्यक्ति पर हमला...एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने पुस्तक प्रदर्शनी में तोड़-फोड़ की





छाया-१
नई दिल्ली : डीयू में एबीवीपी कार्यकर्ताओं ने जनचेतना सचल प्रदर्शनी वाहन को तोड़ डाला।
छाया-२
नई दिल्ली : रोष प्रदर्शन के लिए टूटे हुए कांच के बीच तख्ती लगा दी गई है-एबीवीपी के फासिस्ट गुंडों का सांस्कृतिक प्रदर्शन।

यह गाड़ी हिंदी पट्टी में प्रगितशील किताबें जनता के बीच पहुंचाने का काम एक दशक से कर रही है। इसमें भगत सिंह, प्रेमचंद, नागार्जुन, त्रिलोचन, मुक्तिबोध, रंगनायकम्मा, मैक्जिम गोर्की, चेखव, तोल्सतोय, जैक लंडन के साथ यूरोपीय, रशियन, अमेरिकी और एशियाई साहित्य व दर्शन की किताबें मिलती हैं। साथ ही साथ मार्कसवादी साहित्य भी मिलता है। लेकिन देश में एक खासतरह की ही विचारधारा चाहने वालों को यह मंजूर नहीं है। मानव इतिहास के सबसे दारुण दृश्यों के विलेन उनके नायक हैं।
हिटलर सबसे बड़ा योद्धा, मुसोलिनी प्रेरणा स्रोत, नाथू राम गोडसे उनका आदर्श और नरसंहारक नरेंद्र मोदी उनका नेता है। वे बड़े ठसके के साथ वेलेंटाइन डे पर महिलाओं का चीर हरण करने से भी नहीं शर्माते हैं, कुंठा ग्रस्तता और इतिहास विमुख ये मनुष्य के रूप में वानरी सेना साहित्य, संस्कृति और लोकतंत्र का चीरहरण कर उसे अपनी रखैल बनाने की कोशिश में बड़े बड़े सुनियोजित नरसंहार आयोजित करवाते हैं। नरकंकालों पर अट्टाहास करने वाले ये नरपिशाच इस देश को मध्यकालीन सभ्यता की कब्र बना देने पर तुले हुए हैं इसलिए हर जगह जहां सोच है विचार है, सभ्यता है उसे नेस्तनाबूद करना वे अपना परम कर्तव्य समझते हैं। उनकी संस्कृति है विध्वंस की।
कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश के प्रोफेसर की हत्या करने के बाद दो दिन पहले दिल्ली विश्वविद्यालय में भी उन्होंने यही किया है। शायद इसीलिए इस टूटी हुई गाड़ी पर एक तख्ती लगी हुई है-एवीबीपी के फासिस्ट गुंडों का Òसांस्कृतिकÓ प्रदर्शन

Tuesday, January 12, 2010

आखिर इतने लोग किसी आतंकवादी के जनाजे में तो नहीं आए होंगे





१२ जनवरी मंगलवार को श्रीनगर से ६७ किमी दूर अभामा का यह दृश्य है। यहां एक नौजवान के शव की अंत्येष्टि के लिए हजारों लोग आए हुए हैं। यही नहीं महिलाएं, बच्चे, बच्चियां और बूढ़े भी श्रद्धांजलि देने के लिए दूर दराज से पहुंचे। भारतीय सुरक्षा बलों के साथ संघर्ष में रियाज अहमद नाम के इस नौजवान की मृत्यु हुई। प्रशासन कह रहा है कि रियाज आतंकवादी था। लेकिन हजारों लोग उसके जनाजे में उमड़े। यह बिल्कुल सीधा साधा ठोस तथ्य है कि अभामा में हजारों लोग इस मौके पर पहुंचे। महिलाएं रो रही थीं। बच्चे सुबक रहे थे। माएं छाती पीट रही थीं और प्रशासन कह रहा था कि यह एक आतंकवादी है। यकीन नहीं होता। एक आतंकी, जिसने कथित तौर पर अभामा के हजारों लोगों की जिंदगी को अपनी हरकत से हलकान कर कर रख दिया था, की अंत्येष्टि में हजारों लोग जमा हुए। प्रशासन लगातार कह रहा है कि वह एक खुंखार आतंकी था। जबिक देखने में यह एक २५-३० साल का गबरू नौजवान का शव है। प्रशासन के दावों पर यकीन नहीं होता। आतंकवाद की परिभाषा में जरूर कुछ गड़बड़ी है।

Saturday, January 9, 2010

प्ले कार्ड् देखिए क्या कहते हैं इन एनजीओ वालों को


प्लेकार्ड पर क्या लिखा है-

१-हमको जिसने किया अनाथ
उनका तुम क्यों देते हो साथ?

२-हत्यारों के पनाहगार
किसके हक में मानवाधिकार?

३-इतना आंदोलन करवाते हो
कहां से पैसा लाते हो?


स्थानीय लोगों ने अब जाना मानवाधिकारवादियों को
ये तथाकथित मानवाधिकारवादियों की धोखाधड़ी लोगों के सामने उजागर हो चुकी है। दो दिन पहले संदीप पांडे और मेधा पाटकर दंतेवाड़ा भी गए थे वहां पुलिसिया जुल्म सह रहे आदिवासियों ने उन्हें घेर लिया। खबर तो यह भी है कि उन्हें तमाचा भी जड़ दिया गया। लेकिन यह सब क्यों? हो रहा है क्योंकि इन लोगों ने जनता के साथ धोखाधड़ी की है सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने के लिए।
१९९८ में पोखरण में परमाणु विस्फोट के खिलाफ संदीप पांडेय ने पोखरण से सारनाथ तक की पैदल यात्रा की थी। उसमें जो लोग शामिल हुए उन्हें बाद में पता चला कि उस पूरी यात्रा को ब्रिटेन की फंडिंग एजेंसी आक्सफेम ने प्रायोजित किया। ये रंगे हुए मानवाधिकारी हैं। जनता को धीरे धीरे हकीकत मालूम हो रहा है... जनता अपने साथ हुए धोखे का बदला लेगी ही

Friday, January 8, 2010

बताओ कहां से पैसा आया



Raipur, 08 jan : Relatives of Naxal violence victims protest in front of social activist Medha Patkar against her exception to Operation Green Hunt being carried out by joint forces to counter Maoists. they asked that from where she got money to carry ngo propaganda???
two days ago In dantewada magsese winner sandeep pa\nday and medha patkar faces aukward situation when they surrounded by thusands of tribal people pritesting that they are agent of attacking force opration green hunt. it is also said to be that sandeep panday was slapped by one of them...
Actually these protest are symbol that these elite people cheated again and again. they showed that they are true leaders of tribels but they always sell these activity to ngo funding agencies like oxfam, ford foundation...
now the woke up and moist contradiction get them know that they are fake..

जनता के लिए पुलिस बन चुकी है राक्षस

हरियाणा में साल भर के अंदर आधा दर्जन महिलाओं ने पुलिस मुख्यालय के सामने जहर खाकर आत्मदाह कर लिया। अभी ताजातरीन मामला हांसी की लक्ष्मी देवी का है। नए साल के पहले महीने में ही छह जनवरी बुधवार को उसने चंडीगढ़ में डीजीपी कार्यालय के बाहर जहर खाकर आत्महत्या कर ली और साथ ही पुलिस की घोर जनता विरोधी घिनौने चरित्र को उजागर कर दिया। देश और हरियाणा में यह पहला मामला नहीं है।
हरियाणा पुलिस मुख्यालय के सामने पिछले साल रोहतक की सरिता ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली थी। पुलिस पर आरोप है कि उसने सरिता के पति को अवैध हिरासत में रखा हुआ था। थाने में जब वह अपने पति का हाल जानने पहुंची तो न केवल उसके साथ दुष्कर्म किया गया, बल्कि यातनाएं भी दी गईं। रोहतक पुलिस के इस क्रूर और वहशियाना रवैया देख सरिता ने डीजीपी कार्यालय में जहर खाकर अपनी जिंदगी खत्म कर ली। इसके बाद करीब आधा दर्जन ऐसी घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
यमुनानगर की शमशीदा बेगम पुलिस उत्पीडऩ का शिकार हो चुकी है। पुलिस की पिटाई से उसका गर्भ गिर गया था। जींद का कुंडू दंपति भी न्याय की उम्मीद में आत्महत्या का प्रयास कर चुका है। रोहतक में आईजी आफिस के बाहर पानीपत की अलका ने आत्महत्या कर ली। उसका पति किसी तरह बच गया था। अलका का कुसूर सिर्फ इतना था कि वह अपने साथ दुष्कर्म के आरोपियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग कर रही थी। नारनौल की पूजा मान ने भी न्याया की आस टूटने पर कुएं में कूदकर जान दे दी थी।

पश्चिम बंगाल में लालगढ़ का माओवादी समर्थित पुलिस संत्रास विरोधी समिति का आंदोलन इसी का आंदोलन है। धनाढ्यों और सफेदपोशों के सामने दुम हिलाने वाली पुलिस का जनता के के साथ वहशियाना अत्याचार समझ के परे भले हो लेकिन इससे इतना तो साफ हो जाता है कि यह पुलिसिया तंत्र जनता को गुलाम बनाए रखने के लिए खड़े किए गए हैं। भगत सिंह की बात सही साबित होती लगती है कि गोरे चले भी जाएं तो भी काले अंग्रेज जनता को गुलाम बनाए रखेंगे। और शोषण का चरखा बदस्तूर चलता रहेगा। इस उत्पीड़न से जनता अपने-अपने तरीके लड़ रही है। कोई शांतिपूर्वक ढंग से सालों धरना दे रहा है तो कहीं लाठी और तीर-कमान निकल आए हैं।
इस लड़ाई का दुखद पहलू यह है कि एक बड़े पैमाने पर लोग एकाकी संघर्ष में टूट कर कायराना आत्महत्या की ओर रुख कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि जहां जनता अपनी इज्जत, जिंदगी और सामाजिकता को बचाने की लड़ाई कर रही है तो शाशन में बैठे काले अंग्रेज इसका दमन कर रहे हैं, न्याय की बात हशिए में चली गई है।

Sunday, November 29, 2009

13 कुंतल की स्वर्ण प्रतिमा

सोनभद्र में 13 कुंतल शुद्ध सोने की बनी प्रतिमा का यूं ही पड़े रहना स्तब्ध कर देता है। पोलवा शिव पहाड़ी, सोनभद्र की खुदाई में निकली सोने की एक टन दो कुंतल, 80 किलो की कृष्ण की मूर्ति खुले में पड़ी है
मान्यतानुसार नगर ऊंटारी के राजा भवानी सिंह पोलवा की शिव पहाड़ी से सोने की मूर्ति निकलवाकर ले गये। वहां भव्य मंदिर का निर्माण कराकर उसे स्थापित करा दिया। मूर्ति के बाबत कोई प्रमाणिक साक्ष्य तो नहीं मिलता लेकिन गुप्तनाथ तिवारी की पुस्तक के अनुसार मूर्ति का निर्माण गोलकुण्डा हैदराबाद में हुआ था। कब और किसने कराया, इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता। माना जाता है भगवान कृष्ण की मूर्ति औरंगजेब के हाथ लगी। उसे खंडित करने के लिए हैदराबाद से दिल्ली ले जाया गया। मूर्ति की चमक दमक पर औरंगजेब की पुत्री शहजादी जेबुन्निसा इस कदर दीवानी हुई कि उसने सुन्दर मूर्ति को खंडित होने से बचा लिया। उसने शिवाजी को पत्र भेजकर मूर्ति प्रेम का इजहार किया था। मूर्ति पाने में असफल शिवाजी गुरु रामदास के पास गए और मूर्ति वापस लाने के प्रति जिज्ञासा व्यक्त की तो उन्होंने शिवाजी को आश्र्वस्त किया कि वह मूर्ति आपको मिल जाएगी। उत्तर पूर्वी काल के दौरान जब मराठों का इस क्षेत्र पर कब्जा हुआ तो उन्होंने औरंगजेब से झटक कर उस बहुमूल्य सोने की मूर्ति को उक्त पहाड़ी में छिपा दिया। समझा जाता है कि उसी समय से उक्त पहाड़ी को शिव पहाड़ी का नाम भी दे दिया गया हो। मूर्ति के बारे में दूसरी जनश्रुति है कि शिव पहाड़ी के पास ही सोन पहाड़ी भी है जहां पहले सोने की प्रचुरता थी। उस समय राजा बरियार शाह का शासन था। लोगों का मानना है राजा बरियार शाह ने ही सोने से उक्त मूर्ति का निर्माण कराया होगा। जो भी प्रामणिक तथ्य हो किंतु भगवान की अनोखी बहुमूल्य प्रतिमा का दर्शन करने के लिए प्रतिवर्ष देश विदेश से हजारों श्रद्धालु वंशीधर मंदिर ऊंटारी पहुंचते हैं। वंशीधर की स्वर्ण प्रतिमा के साथ राधा जी की अष्टधातु मूर्ति स्थापित की गई है। बीएचयू के प्रौद्योगिकी संस्थान के रसायन अभियांत्रिकी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. के.के. श्रीवास्तव बताते हैं कि आदमी का शरीर लगभग 85 फीसदी पानी से बना होता है और सोने का घनत्व पानी की तुलना में 19 गुना अधिक होता है। ऐसे में साढ़े चार फीट की कृष्ण की प्रतिमा का ही वजन लगभग नौ कुंतल से अधिक हो जाता है। ठोस कमलदल व नाग का वजन मिलाकर अनुमानत: वजन 13 कुंतल के आसपास होना आश्चर्य की बात नहीं। मूर्ति के बारे में अभी तक विशेषज्ञ यह नहीं पता कर पाए हैं कि यह कब की बनी हुई है। हलांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह मूर्ति कृष्ण की सबी मूर्तियों से काफी भिन्न है और शायद दुनिया में अपने तरह की अकेली है। इसीलिए इसके संरक्षित करने की बेहद जरूरत है।

Friday, November 27, 2009

जामा मस्जिद पर मिलेगा दो दांत का बकरा


यह दृश्य दिल्ली के जामा मस्जद का है। ईद उल जुहा के हफ्ते भर पहले से ही यहां बकरे ही बकरे दिखते हैं। बुधवार को मैं यहां भूले भटके पहुंच गया। जामा मस्जिद को लेकर तमाम तरह की भ्रांतियां जानबूझ कर फैलाई गई हैं। लेकिन वहां जाकर पता चला कि एक ही देश में रहने वालों के बीच गलतफहमी है। इतना तो पता था कि बकरीद में बकरे हलाल होते हैं लेकिन जब दो दांत और चार दांत के बकरों के बेचे जाने की आवाज कान में पड़ी तो बस एक ही खयाल आया कि कितना कुछ हम बिना जाने ही किसी खास विषय पर पूर्वाग्रह बना लेते हैं। यह तस्वीर आप सबके नजर।

Wednesday, November 25, 2009

यह जाम किसके नाम???




ओबामा ने मनमोहन से कहा आपखा स्वागट है..बस मैनमोहन के आई से असुर धारा टपखने लगी और जाम छलक गया...

Monday, November 23, 2009

किस पर है नजर???

आजमगढ़ की पहचान दाऊद नहीं शकील है

मैं मीडिया पेशेवर हूं और आजमगढ़ का रहने वाला हूं। एक बार एक इंटरव्यू में एक संपादक महोदय ने मुझसे पूछा लिया कि आपको लगता नहीं कि आजमगढ़ के लोगों को शक की नजरों से देखा जाने लगा है। मैं उनका इशारा समझ गया था लेकिन फिर भी पूछ लिया-क्यों?? वह भी मेरा इशारा समझ गए लेकिन बात निकल चुकी थी, बोले-अबू सलेम, सिमी, आईएसआई, अंडरवल्रर्ड और कई आतंकियों के तार वहां जुड़ते हैं। मैंने कहा-यह मीडिया की देन है...अबू सलेम आजमगढ़ से था तो क्या अब आजमगढ़ को इनके नाम से जाना जाएगा? राहुल सांकृत्यायन, राही मासूम रजा, कैफी आजमी, शबाना आजमी इसी धरती से पैदा हुए तो इस धरती को उनके नाम से क्यों न जाना जाना चाहिए।
यह बात बीते साल भर होने को है। आज उसी संपादक के नेतृत्व में निकलने वाले अखबार में अंतिम पेज पर दो कालम में आजमगढ़ के शकील की खबर छपी है। खबर कुछ यूं है--
ÒÒ इंसान में अगर दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो कुछ भी असंभव नहीं होता। इस बात को साबित किया है उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में निजामाबाद निवासी शकील ने। वह सरकारी सहायता के बिना चंदा मांगकर धन इकट्ठा कर पुलों के निर्माण में जुटे हुए हैं। एक रुपये चंदे से शुरू हुआ यह उनका यह जोश एक पुल का तोहफा जनता को दे चुका है। अभी आगे भी उनका इस अभियान को जारी रखने का इरादा है। शकील ने एक एक रुपए चंदा मांगकर क्षेत्र में पुल बनाने का काम शुरू किया और देखते ही देखते उनका सपना साकार हुआ। जनसहयोग से लगभग 65 लाख रुपए की लागत से क्षेत्र में पुल का निर्माण कर इसे जनता को समर्पित कर दिया गया। शकील इसके बाद भी रुके नहीं हैं और वह क्षेत्र में ही एक और पुल का निर्माण कराने में लग गए हैं। वह तीसरे पुल के निर्माण की अच्छा भी संजोए हुए हैं। जनमानस से जुड़ी उनकी इस महत्वाकांक्षी पुल योजना की खास बात यह है कि इसमें शासन प्रशासन और जन प्रतिनिधियो से सहयोग के नाम पर धेला भी न मिला और न ही लिया गया पर पुल का निर्माण हो गया। शकील ने बताया कि उन्हें पुल बनवाने का जुनून उस समय सवार हुआ जब लगभग छह वर्ष पूर्व आजमगढ़ जनपद में सरायमीर के पास के एक विद्यालय के बच्चे नाव से नदी पार कर स्कूल जा रहे थे कि अचानक तभी नाव पलट गई, जिसमें 11 च्च्चे तो बचा लिए गए परन्तु एक बच्चा डूब कर मर गया। एक बच्चे के डूबने की इस घटना ने शकील को झकझोर दिया और उसे नदी पर पुल बनाने का जुनून सवार हो गया। जब चंदे की रकम खत्म हो जाती तब निर्माण कार्य बंद हो जाता। ÓÓ
यह खबर ही उन संपादक महोदय या इस तरह के बेजा सवाल उठाने वालों का जवाब है और सवाल भी कि जब आतंकवाद का रिश्ता आजमगढ़ से जुड़ता है तो उसे लीड मार देते हैं...और उसे और सेंसेशनल-चटपटेदार बना देते हैं जबकि साकारात्मक खबर को खा जाते हैं। नाकारात्मक टीआरपीबाजी के मारे चैनल ही नहीं अखबार बेचारे भी हैं।

Sunday, November 22, 2009

अमेरिका का इमोशनल अत्याचार

बराक ओबामा की हालिया चीन यात्रा में उभरी अमेरिका-चीन की जुगलबंदी से भारत के रणनीतिकारों के होश फाख्ता हैं। यही कारण रहा कि हू जिंताओ और बराक ओबामा के संयुक्त बयान पर भारत में तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त हुई। हालांकि यह कोई नई बात नहीं है जब अमेरिका एक तरफ भारत को पुचकारता है तो दूसरी तरफ अपने हित साधने में उसे भारत की जरा भी परवाह नहींहोती। पाक प्रायोजित आतंकवाद का मामला इसका सबूत है। भारत पूरा जोर लगाकर पाकिस्तान की करतूतों का भंडा फोड़ता है, सबूत पर सबूत पेश करता रहता है लेकिन अमेरिका को वही करना होता है जो उसके हित में होता है, वह बिना कुछ बोले सैन्य मदद पाक की जेब में डाल देता है। जब भारत आपत्ति दर्ज कराता है तो वह कहता है कि हम दुनिया के दो शक्तिशाली लोकतांत्रिक देश हैं और हमारी रणनीतिक साझेदारी नैसर्गिक है, ऐसे में भारत को डरने की जरूरत नहीं है। वह भारत की स्वामीभक्ति सस्ते में हासिल करना चाहता है। यह इमोशनल अत्याचार नहींतो क्या है?
प्रधानमंत्री चार दिन के राजकीय यात्रा पर अमेरिका गए हुए हैं। भारत के रणनीतिकारों का कौशल देखिए...उन्हें इस बात पर ज्यादा गर्व है कि पीएम के भोज की व्यवस्था ओबामा परिवार खुद देख रहा है। टेंट और रसोइये का इंतजाम खुद अमेरिका की प्रथम महिला मिशेल ओबामा कर रही हैं। प्रधानमंत्री के शाकाहार के लिए अलग अलाव चढ़ेगा।
ओबामा अभी-अभी जापान और चीन में झुक कर आए हैं यहां भी थोड़ा झुक लेंगे...भारत को और क्या चाहिए? आतंकवाद का मुद्दा, व्यापार का मुद्दा, परमाणु अप्रसार का मुद्दा...ईरान-भारत-पाकिस्तान गैस पाइप लाइन का मुद्दा...ये सब तो बातें हैं...इन बातों का क्या... होती रहेंगी। विमान भर कर गए रणनीतिकार अमेरिका के डिनर के जायके से फूल जाएंगे। भारत आकर कहेंगे...दोनों नेताओं में सभी मुद्दों पर झूम कर बातचीत हुई। पर उनसे पूछिए कि इस झप्पी का नतीजा क्या रहा तो वे डिनर में पेश किए गए मुगलई चिकन की तारीफ करेंगे और बताएंगे कि वह खासकर फला खानसामे से खासकर भारत की मेहमानवाजी में बनवाए गए थे...बड़ा जायकेदार डिनर था, ओबामा तो ऐसे बिछे कि लगा ही नहीं वह महाशक्ति के नेता हैं।
माननीय प्रधानमंत्री जी देश को बताएंगे कि परमाणु करार पर अमेरिका को हमने पटरी पर ला दिया है। व्यापार पर द्विपक्षीय सहयोग की बात हुई है और आतंकवाद पर अमेरिका कड़ा रुख अपनाने का वादा किया है। हालांकि यह बात गोल कर जाएंगे कि अमेरिका ने परमाणु करार में अप्रसार का रोड़ा डाल दिया...कि पाकिस्तान की जेब गरम न करने का कोई वादा नहीं किया...कि देश की तरक्की में मील का पत्थर साबित होने वाली भारत-पाक-ईरान गैस पाइप लाइन में टांग अड़ाने की उसने जिद नहीं छोड़ी है। और इस प्रकार पीएम की अमेरिका यात्रा आशातीत सफलताओं के साथ संपन्न हो जाएगी। यह इमोशनल अत्याचार नहीं तो क्या है?